Pages

Monday, December 18, 2006

बस नम्बर डी.टी.सी.-३७१०

वैसे तो इस नाचीज़ को अपनी हदो के बारे में पता है और वह यह अच्छी तरह से जानता है कि दो-चार अलग-अलग किस्मो के हिन्दी के शब्दो को को बाँध लेने से कोइ भी आदमी हिन्दी साहित्यकार नहिं बन जाता है, पर बाऊजी, आप ही बतांये, अगर दुनियाँ भर में फ़ैले ईस मकङ जाल (कुछ अंग्रेजो से पींछे छूट गयी बोतलो के ढ्क्क्न, इसे world wide web कहें है) के होते हुए अगर हमने अपने मन कि भडास निकालने के लिये एक यात्रा संस्मरण भी ना लिखा तो क्या लिखा ? यात्रा सन्स्मरण तो धीमे वसन्त कि तरह होते है, जो हर चार साल में दो बार अच्छे लिखे जा सकते ( ऐसा ऊक्साने के लिये इस देश के वित्त मन्त्री को अधिकार होता है,क्योंकी ऊनका ऐसा मानना है कि आम आदमी,यात्रा को मौलिकता चार साल मे केवल दो ही बार दे सकता है)

वैसे तो मुद्दे पर आने से पहले, इधर-उधर का साहित्य झाड्ना एक अच्छे लेखक कि निशानी होती है, पर डरता हूँ कि मेरे ऐसा करने से आप अपना "कीमती वक्त" की पुडियाँ कहीं और बना कर फ़ेक देंगे। तो मै अब सीधे मुद्दे पर यानि "बस" पर आता हूँ।


माई लार्ड, जरा गौर फ़रमाईये, यह वहीं बस की तसवीर है जिससे हमारे भूतपूर्व प्रधानमन्त्री अटल जी ने अपनी पाकिस्तान के लिये सढ-भावना यात्रा शुरु कि थी । अब आप पुंछेंगे कि इस सब से इस नाचीज़ का क्या लेना देना है.. माई-लाँर्ड.. मुद्दा सिर्फ़ इतना है कि १ नवम्बर कि सुबह ठीक बारह बजे, लेखक ने इसी बस ( बस नम्बर डी. टी. सी-३७१०) से अपनी नयी-दिल्ली से रूडकी तक की यात्रा को अन्जाम दिया था । लेखक को इस "गौरव" का भी अहसास है कि उसे वहि सीट मिली जिस पर परम आदरणीय श्री अटल जी विराजमान थे

आईये अब आप लोगो को वातावरण को थोडा विवरण देदे।


डीटीसी कि यह अभूतपूर्व बस मे एक चिर-परिचित खुशनुमा माहौल था और बस का क्षेत्रफ़ल भारत की जनसंख्या मे विविधता को दरशा रहा था । शहंशाह अकबर के जमाने का, काले कपडे मे छुपा अल्प-संख्यक शबाब आगे की सीट पर था, तो उनके पीछे, लट्ठ-मार बहुल-संख्यक जिह्वाये [अंग्रेजी:Tongues] माँ-सरस्वती को धता बताते हुए, लाठी-शस्त्र के साथ मौजूद थी।

वैसे तो बस मे और भी बहुत सारे लोग थे पर जिस तरह से केन्द्र सरकार भारत के पूर्वी राज्यों** के बारे मे न ज्यादा सोचना पसन्द करती, है और न ही बोलना, लेखक भी अपने इस कर्म को ज्यादा संजीदगी से नही देखता है।

(**मेघालय,आसाम,त्रिपुरा..वगैरह के बारे मे आपने बारहवी कक्षा तक तो पढा ही होगा, जी हाँ यह सारे राज्य भारत के ही अभिन्न अंग है! सरकार भले ही इन्हे भूले बैठी रहे पर आप लोग जरूर इन्हे याद रखें क्योकि आपने भले ही अपनी पढाई पूरी कर ली हो पर आपके बच्चों को तो अभी पढना है, आ. ए. स. की परीक्षा देनी है, सुनते है सिलेबस मे काफ़ी "कवर" कराते है)

आइयें अब बात करे उस "हाँट"- सीट की--
बस के दरवाज़े से अन्दर जाने के बाद सीधे हाथ की तरफ़ दो सीटे थी जो कि बाकी सीटों कि अपेक्षा थोडी ऊंची थी, इन्ही मे से एक सीट पर अटल जी बेंठे रहे होंगे, और उसके साथ वाली सीट पर जरूर कोइ ऐसी शख्सियत बेंठी होगी जिसका काम अटल जी को छोटी और मोटी सलाह देना रहा होगा (यानि कि अगर इस सीट पर आज मनमोहन सिंग बैठे हो तो पास वाली सीट पर सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रकाश कारत का अधिकार होगा।)

मुझे इस बात को जान कर बडा ताज्ज़ुब हुआ कि एक प्रधानमन्त्री को दरवाज़े के इतनी पास जगह दी गयी लेकिन फिर कुछ दिमागी मशक्कत करने पर समझ आया कि यह अटल जी के घुट्नों कि तकलीफ़ को ध्यान मे रखते हुए किया होगा ताकि वह आसानी से अन्दर-बाहर जा सके।

कहते है इन्सान का दिमाग एक दो-धारी तलवार होता है और चूँकि (कुछ!) लेखक भी इन्सान होते है, हमारे दिमाग ने तुरत ही इस सिचुएशन का एक अलग ही रुपान्तरन प्रस्तुत किया , सोचा अगर यह बस भारत देश है तो क्या यही कारण है कि अटलजी इतनी जल्दी इस देश-रूपी बस मे दो बार घुट्नों कि तकलीफ़ (बिल्कुल ठीक समझ रहे है आप, समझोता सरकार के घटक दल किसी दुखते हुए घुटनो से कम नही होते) के होते हुए भी सीट पर विराजमान हो गयें ?

हे श्र्ध्येय शरद जोशीजी /के.पी. सक्सेनाजी इस उठ्ते हुऐ लेखक को माफ़ करना, क्योकिं हो सकता है कि कुछ पाठक-गणों को यह संस्मरण आपके लिखे गद्यो से प्रभवित लगे और लिखें मे से "प्लेजियारिस्म" की बूँ आने लगे । सद्द्दाम को हाज़िर-नाज़िर जान कर यह लेखक बुश की कसम लेता है कि उसका कुमारी काव्या विस्वनाथन से कोई लेना-देना नही है।

लो बाउजी, अब तो हम बडे लेखकोँ में शामिल हो गये है, घन्टा भर हो गया है पर देखिये अभी तक हमारी बस नही चली है। सच कहिंये तो बस सिर्फ़ एक बार ही चली थी उसके बाद तो वह सिर्फ़ भारत की विकास-दर कि तरह रेंगती रही । बस के बाहर का वातवरण भी अभूतपूर्व और गंगा-मय था एक हूजूम सा हरिद्वार की तरफ़ उमडा पड रहा था। बस के चारों ओर अलग-अलग किस्म के वाहन अपने पास वाले वाहन के बदन को चूमते हुऐ आगे बड रहे थे । यह कहना ठीक होग कि नेहरू के सपनो का औध्योगिक भारत और चौधरी अजित सिंग की हरित-क्रान्ति इस तरह से घुल-मिल गयी थी कि यह समझना मुश्किल हो रहा था कि साल भर के पापों से भरे घडों को सारे लोग एक ही दिन में कैसे साफ़ कर लायेंगे ?

वैसे तो हिन्दुस्तानी, सालों से मन्दिरों और नंदियों की शरण मे जाते रहे है, पर अब के बार भीड को देख कर लगा कि अगर इस वक्त भूपेन्द्र हज़ारिका कहते..क्या कहाँ आपने? आप नही जानते वह कौन है? अरे वह गाना तो सुना है ना आपने "दिल हुम-हुम करे" ..उन्होने ही गाया है!! अगर आप इनके नाम से अभी तक परिचित नही थे तो आप मे और केन्द्र सरकार मे कुछ भी फ़र्क नही है, और मेरी साफ़गोई के लिये माफ़ किजीयेगा, इस नाते आप को या आपके बच्चों को आ. ए. स. की परीक्षा की तैयारी के लिये ज़े. एन. यू. कैम्पस की तरफ़ मुंह तक करके सोने का भी अधिकार नही है!!)


खैर बात यह हो रही थी कि भूपेन्द्र दा उस सीन मे होते तो क्या कहते?


कहते : ग़ँगा तुम बहती हो क्यों ? कहते क्या जी पूरा गा ही डालते !!


ऐसे ही न जाने कितने विचारों से दो-दो हाथ करता हुआ मै कब निद्रा देवी की गौद मे चला गया, पता नहीं लगा। और आखिर वह समय भी आ ही गया जब कन्ड्क्टर ने कहाँ, साब रुड़्र्की आने को हो है और मै आपके लिये यहाँ पर ज्यादा देर तक नहीं रोक पाऊँगा, आपके साथ बात करते-करते अच्छा समय कट गया, घर जा कर सब को जरूर बताइयेंगा कि आपने किस खास बस मे सफ़र किया है।

मै सौचने लगा..

अटलजी ठीक से चल नही पाते है।
मुशर्रफ़ मियाँ ठीक से चलना नही चाह्ते है।
डी.टी.सी.-३७१० की भी ऊमर हुई ही समझो

रही बात "सदा-ए-सरहद" की,
"सदा" है, तो "सदा" चलती रहेगी। (१उर्दू: आवाज़, २हिन्दी: हमेशा)

आमीन !

2 comments:

Pankaj said...

guru - chahha gaye!!

sachin said...

Gaurav - Well said. Tumhari Hindi ka ek to chahane wala abhi hai. Aaj pata chala ki Bus se safar karne wala koi aisa waisa banda nahi tha (Nahi hi Atal Ji aur Nahi App:)). Keep writing !!