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Wednesday, July 29, 2009

दूर नहीं मेरा कोई स्पंदन

दूर नहीं मेरा कोई स्पंदन

क्यों कहता है तुम्हारा यह मन
दूर तुमसे है, मेरा कोई स्पंदन |

मेरे साथ है
तुम्हारी बिंदिया की दमक,
तुम्हारी आखों की चमक,
तुम्हारी आवाज़ की खनक |

मेरे साथ है,
तुम्हारे होठों का नमक,
तुम्हारी सासों की दहक,
तुम्हारी जुल्फों की महक |

मेरे साथ है,
ऋतुगंधा का प्राँगण
बाँहों भर आलिंगन, तुम्हारा चारु-मन |

याद अनगिनत, हर बरस, हर पल
तुम्हारी-मेरी मीठी अन-बन |

फिर क्यों कहता है तुम्हारा यह मन
दूर तुमसे है, मेरा कोई स्पंदन |

- गौरव गुप्ता ( २० नवम्बर, २००८ )

Saturday, July 18, 2009

जिंदगी की दौड

जिंदगी की दौड

जिंदगी की दौड़, थकान तो होगी

निकली है अगर धूप तो शाम भी होगी |


खुदा मन्दिर में, भगवान मस्जिद में

देखना एक दिन यह बातें आम होगी |


बोतलें खोल कर पी हमने बरसो

कब यह पता था तुम्हारी आँखे जाम होगी |


तुम्हारा इंतज़ार और वोह पीपल का पेड़,

पत्तियां चल बसी, अब जड़े तमाम होगी |


- गौरव गुप्ता, २५ जुलाई, २००८

सुबह से सुबह तक

सुबह से सुबह तक

धूंप के घोडे, सूरज ने छोडे
समय का पहिँया, धीरे से घूमा
खिडकी के पल्ले, हँवा ने चूमे
बालों की लट, चेहरे पर झूंले


दहका तन, जैसे तपता दिन
बहका मन जैसे जंगल हिरन
एक करवट चादर पर सलवट
हृदय स्पन्दन,लगे जो आहट


समय का पहिँया, फिर से घूमा
दरवाजे का पल्ला,पल्ले को चूमा
ढली धूँप, सँध्या ने दिखाया दर्पण
चेहरे का हथेलियों को समर्पण

रात का आगमन, पायल सी छन-छन
हृदय धङकन, सितारों सा स्पन्दन


अगली सुबह, नयी दस्तक
आँखो मे, ओँस की बूंदे,
मौन स्वीकृति, अखियाँ मूंदे
समय का पहिँया, फ़िर से घूमा


-गौरव गुप्तारविवार, १९ जुलाई, २००९