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Saturday, July 18, 2009

सुबह से सुबह तक

सुबह से सुबह तक

धूंप के घोडे, सूरज ने छोडे
समय का पहिँया, धीरे से घूमा
खिडकी के पल्ले, हँवा ने चूमे
बालों की लट, चेहरे पर झूंले


दहका तन, जैसे तपता दिन
बहका मन जैसे जंगल हिरन
एक करवट चादर पर सलवट
हृदय स्पन्दन,लगे जो आहट


समय का पहिँया, फिर से घूमा
दरवाजे का पल्ला,पल्ले को चूमा
ढली धूँप, सँध्या ने दिखाया दर्पण
चेहरे का हथेलियों को समर्पण

रात का आगमन, पायल सी छन-छन
हृदय धङकन, सितारों सा स्पन्दन


अगली सुबह, नयी दस्तक
आँखो मे, ओँस की बूंदे,
मौन स्वीकृति, अखियाँ मूंदे
समय का पहिँया, फ़िर से घूमा


-गौरव गुप्तारविवार, १९ जुलाई, २००९

2 comments:

GANGA DHAR SHARMA said...

Good.

mastkalandr said...

आँखो मे, ओँस की बूंदे,
मौन स्वीकृति, अखियाँ मूंदे
समय का पहिँया, फ़िर से घूमा..
वाह वाह बहुत ही सुन्दर ..लब्जों का शानदार उपयोग ..,
आपका स्वागत है... मक्