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Wednesday, July 29, 2009

दूर नहीं मेरा कोई स्पंदन

दूर नहीं मेरा कोई स्पंदन

क्यों कहता है तुम्हारा यह मन
दूर तुमसे है, मेरा कोई स्पंदन |

मेरे साथ है
तुम्हारी बिंदिया की दमक,
तुम्हारी आखों की चमक,
तुम्हारी आवाज़ की खनक |

मेरे साथ है,
तुम्हारे होठों का नमक,
तुम्हारी सासों की दहक,
तुम्हारी जुल्फों की महक |

मेरे साथ है,
ऋतुगंधा का प्राँगण
बाँहों भर आलिंगन, तुम्हारा चारु-मन |

याद अनगिनत, हर बरस, हर पल
तुम्हारी-मेरी मीठी अन-बन |

फिर क्यों कहता है तुम्हारा यह मन
दूर तुमसे है, मेरा कोई स्पंदन |

- गौरव गुप्ता ( २० नवम्बर, २००८ )

5 comments:

Nidhi said...

Wow...sizzling...very well said...

M VERMA said...

अच्छी रचना

Ritu said...

very nice

Renaissance of PG said...

Amazing poem....
Liked it very much....
Couldn`t find any link to follow you.

संजय भास्कर said...

Amazing poem...