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Wednesday, August 5, 2009

कैसी लगती हूँ मै ?

कैसी लगती हूँ मै ?

तेरह कि थी तुम
जब से मेरे पास आती रही हो
पूँछती थी,
कैसी लगती हूँ मै ?
और मै तुम्हे सिर्फ़ देखता था,
मगर रहता चुप-चाप

मुझे याद है
जब तुम पहन कर आयी थी
पहली बार
कांनो मे बाली
और होठों पर लाली
कैसी लगती हूँ मै ?
यही पूँछा था न तुमने ?

आज फ़िर आयी हो
इतने सालों के बाद
सर पर लाल रंग की चूनर
और गँहनो से सजी,
सिंदूर और मंगलसूत्र से
कुछ क्षणो दूर

शायद आज आखिरी बार
उसी प्रश्न के साथ
कैसी लगती हूँ मै ?
मै आज भी निरुत्तर खड़ा हूँ
क्या करूँ, आइना हूँ,
आइने कि तरह टूटा पड़ा हूँ ।

2 comments:

‘नज़र’ said...

अत्यन्त सुन्दर रचना है
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'विज्ञान' पर पढ़िए: शैवाल ही भविष्य का ईंधन है!

Vidit Jain said...

एक ही पल में ये क्या हो गया,
जो ना होना था वोह हो सा गया है |
कौन जानता था बाल सफ़ेद होने के बाद भी
कौन जानता था बाल सफ़ेद होने के बाद भी
ऐसा कुछ हो सकता है ,
एक ही पल में
कोई लूट ले गया है !!
जो न होना था गया वोह हो सा गया है !