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Monday, March 1, 2010

ख्वाब़

पलकों के आँसमान तले
रात की शाख़ पर
कुछ ख्वाब़ के परिंदे बैठे

सुबह की कोंपल फूटी
उड़े ख्वाब़ अलसायें कुछ
कुनमुनाये, पंख फ़ैलाये कुछ

दिन के उजा़ले ने ली उड़ान,
वास्तविकता की धूप, ऊँचाई की थकान
शाम के तने पकड़ कर,लौटे शाख़ पर
थके-हारे गिर पड़े निढ़ाल

उम्मीद की थपकियाँ ने,
हौसलोँ की लौरियाँ ने
फिर से दाने फेँके है

पलकों के आँसमान तले
रात की शाख़ पर
कुछ ख्वाब़ के परिंदे फिर आ बैठे है

2 comments:

Amitraghat said...

"बहुत बढ़िया..."
प्रणव सक्सैना
amitraghat.blogspot.com

shweta said...

Lovely...roz marra ki zindagi aur usse jude hamare khwab, kuch bante kuch bigadte...beautifully expressed!