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Monday, April 5, 2010

मै

अँधेरे को गुमाँ तक नही, दियाँ हूँ मै,
फ़कत जुगनूँ की तरह नज़र आता हूँ मै

गर कलम उठाता तो वक़्त भी थाम देता,
फिल-हाल राशन की कतार में नज़र आता हूँ मै

पानी हूँ, प्यास बुझा सकता हूँ लेकिन,
इन दिनों बहुत कम जगह नज़र आता हूँ मै

गमों का बौझ बढ गया है इस कदर
नमाज़ का वक़्त हो न हो, झुका जाता हूँ मै

कुछ कहता नहिं, मगर ख़त की उम्मीद रख
सामने होती हो तो कब बोल पाता हूँ मै

दर्द की कलम सूखने लगी है शायद
अधूरी गज़ल को अक्सर यह समझाता हूँ मै

वक़्त सही !

दुख हो, पीड़ा हो, हो टूटे अरमान सारे,
सपने देखने का वक़्त यही सही |
पीलि शाँखे, सूखे दरख्त, हो पतझड़ कही
प्यास बुझाने का वक़्त यही सही |

दूरियाँ हो, खट्टे रिश्ते हो, हो मीठि अनबन,
माँ से बात करने का वक़्त यही सही |
टूटे रिश्ते, साँलों की अनबन,
होली खेलने का वक़्त यही सही |

अलग बोली, अलग धरम,या अलग रिवाज़
दोस्ति का हाथ बढाने का वक़्त यही सही |
सोई आँखे, जागी उम्मीदे, और कल का ख्वाँब
नये सपने सजोने का वक़्त यही सही ।

छोटि उंगलिँया, ज़वाँ धड्कन, या कापते पैर
मुस्कराने का वक़्त यही सही ।

तुम मुझे क्या सिखाती हो जिंदगी,
मै तुझ से कहता हूँ,
मै जब सही, तेरे लिये वह वक़्त सही |