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Monday, April 5, 2010

वक़्त सही !

दुख हो, पीड़ा हो, हो टूटे अरमान सारे,
सपने देखने का वक़्त यही सही |
पीलि शाँखे, सूखे दरख्त, हो पतझड़ कही
प्यास बुझाने का वक़्त यही सही |

दूरियाँ हो, खट्टे रिश्ते हो, हो मीठि अनबन,
माँ से बात करने का वक़्त यही सही |
टूटे रिश्ते, साँलों की अनबन,
होली खेलने का वक़्त यही सही |

अलग बोली, अलग धरम,या अलग रिवाज़
दोस्ति का हाथ बढाने का वक़्त यही सही |
सोई आँखे, जागी उम्मीदे, और कल का ख्वाँब
नये सपने सजोने का वक़्त यही सही ।

छोटि उंगलिँया, ज़वाँ धड्कन, या कापते पैर
मुस्कराने का वक़्त यही सही ।

तुम मुझे क्या सिखाती हो जिंदगी,
मै तुझ से कहता हूँ,
मै जब सही, तेरे लिये वह वक़्त सही |

1 comment:

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।