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Monday, April 5, 2010

मै

अँधेरे को गुमाँ तक नही, दियाँ हूँ मै,
फ़कत जुगनूँ की तरह नज़र आता हूँ मै

गर कलम उठाता तो वक़्त भी थाम देता,
फिल-हाल राशन की कतार में नज़र आता हूँ मै

पानी हूँ, प्यास बुझा सकता हूँ लेकिन,
इन दिनों बहुत कम जगह नज़र आता हूँ मै

गमों का बौझ बढ गया है इस कदर
नमाज़ का वक़्त हो न हो, झुका जाता हूँ मै

कुछ कहता नहिं, मगर ख़त की उम्मीद रख
सामने होती हो तो कब बोल पाता हूँ मै

दर्द की कलम सूखने लगी है शायद
अधूरी गज़ल को अक्सर यह समझाता हूँ मै

6 comments:

दिलीप said...

sunder abhivyakti...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

Udan Tashtari said...

गमों का बौझ बढ गया है इस कदर
नमाज़ का वक़्त हो न हो, झुका जाता हूँ मै


बहुत खूब!

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

Surabhi said...

गमों का बौझ बढ गया है इस कदर
नमाज़ का वक़्त हो न हो, झुका जाता हूँ मै

must say very well written and deeply expressed-surabhi lodha bhandari

Nisha said...

गमों का बौझ बढ गया है इस कदर
नमाज़ का वक़्त हो न हो, झुका जाता हूँ मै

कुछ कहता नहिं, मगर ख़त की उम्मीद रख
सामने होती हो तो कब बोल पाता हूँ मै

ye panktiya.. bahut hi sundar hai.