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Thursday, June 10, 2010

बारिश

बारिश की बूँदे,
बैठ गयी, बादल के कांधो पर
हँवा के झोंको ने
फ़ैलायें अपने हाथ
पूँछा चलोगी मेरे साथ ?
हज़ारों आँखे
जोहती तुम्हारी बाट

बूँदे हुई असमंजस
देख बादल का मुँह सफ़ेद
किया इंकार का संकेत

बावरी हुई हँवा
गुस्से में पैर पट्के
धूल के कण झट्के
ली कसम अब ना फैलाऊंगी बांहे
चाहे बूँदे कितना ही चाहे

कुछ समय गुजरा

बादलोँ के कांधे झुके
बदन भी पडा काला
कुनकुनि हुई धूपँ भी

बूँदो का मन भी पसीजा
चढ़ी बादलों के कंधो पर
ढूंढा हर नदी, हर नाला
पाया सिर्फ़ धरती का तपता माथा

सारी सहेलिंयों को लिया साथ
की हवाँओ से गुजारिश
हवाँ ने पकडे बूँदो के हाथ

जब पहुँची धरा पर,
धरती कि आँखे नम थी
अब के बरस,
बारिश की हर एक बूँद, मरहम थी|