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Thursday, June 10, 2010

बारिश

बारिश की बूँदे,
बैठ गयी, बादल के कांधो पर
हँवा के झोंको ने
फ़ैलायें अपने हाथ
पूँछा चलोगी मेरे साथ ?
हज़ारों आँखे
जोहती तुम्हारी बाट

बूँदे हुई असमंजस
देख बादल का मुँह सफ़ेद
किया इंकार का संकेत

बावरी हुई हँवा
गुस्से में पैर पट्के
धूल के कण झट्के
ली कसम अब ना फैलाऊंगी बांहे
चाहे बूँदे कितना ही चाहे

कुछ समय गुजरा

बादलोँ के कांधे झुके
बदन भी पडा काला
कुनकुनि हुई धूपँ भी

बूँदो का मन भी पसीजा
चढ़ी बादलों के कंधो पर
ढूंढा हर नदी, हर नाला
पाया सिर्फ़ धरती का तपता माथा

सारी सहेलिंयों को लिया साथ
की हवाँओ से गुजारिश
हवाँ ने पकडे बूँदो के हाथ

जब पहुँची धरा पर,
धरती कि आँखे नम थी
अब के बरस,
बारिश की हर एक बूँद, मरहम थी|

7 comments:

शोभा said...

बारिश की बूँदे,
बैठ गयी, बादल के कांधो पर
हँवा के झोंको ने
फ़ैलायें अपने हाथ
पूँछा चलोगी मेरे साथ ?
हज़ारों आँखे
जोहती तुम्हारी बाट
वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

Jandunia said...

महत्वपूर्ण पोस्ट, साधुवाद

Shekhar Kumawat said...

हज़ारों आँखे
जोहती तुम्हारी बाट
वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

baht khub

संजय भास्कर said...

बारिश की बूँदे,
बैठ गयी, बादल के कांधो पर
हँवा के झोंको ने
फ़ैलायें अपने हाथ
पूँछा चलोगी मेरे साथ ?

इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

संजय भास्कर said...

सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

Nisha said...

bhut khub.. bhut sundar..iske saath hi aapki recent post 'baarish bhi akharti hai' bhi padhi.. vaha bhi atyant sundar lagi. likhte rahe va jaldi jaldi likhe.

shweta said...

Bahut sundar likha hai...beautiful and heart touching.