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Wednesday, July 21, 2010

बारिश भी अखरती है !!

मेरे चेहरें से हर वक़्त रुमानियत टपकती है
बाग मे होता हूँ, तो हर कली चटकती है

बेइंतिहाँ मोहब्बत की है तुझसे मैने
इकरार तो करुँ, मगर जालिम जुबाँ अटकती है

आफ़ताब समंदर की चादर ढक कर सो गया है
मुलाकात जो कल खत्म हुई, वो आज खटकती है

वो जो चंद लम्हें, गुज़रे थे इक चादर मे
बरस गुज़र गये ,मगर चादर अब भी महकती है

वही पुराना अच्छा मौसम है, सिर्फ़ तुम नही हो
अब बहार अखरती है तो बारिश भी अखरती है

1 comment:

बेचैन आत्मा said...

वो जो चंद लम्हें, गुज़रे थे इक चादर मे
बरस गुज़र गये ,मगर चादर अब भी महकती है
...बहुत खूब.