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Sunday, September 26, 2010

इबादत, इस बार असर थी !

जिनके पैगाम तक के आने की उम्मीद उमऱ भर ना थी
उनके आने की खबर, हमे छोड शहर भर को थी |

वो मिले तो हमसे, मंजूर है सारे गिले-शिकवे
मगर खामोश गुजरी जो कल शाम, वो कहर थी |

तमाम रात तेरी बिखरी जुल्फों को समेट्ने मे निकल गयी
हटी जब काली बदली, या तो वोह नूर था या फिर सहर थी |

गर नज़र चुराता हूँ भरी मह्फ़िल मे तो यह समझ
वोह मेरि बवफ़ाई नही, तेरी रुसवाई कि फ़िकर थी |

कुछ ना हासिल होगा नसिहते देने से और लेने मे
खता है, तो रहेगी, पर वह खता तेरी ही नज़र थी |

अब्बा ने मेरे किताबे-ए-इश्क़ से कुछ पन्ने निकाल फ़ेक दिये
अब वोह नज़र गयी,वोह इशारे गये तो बाकि किताबें बेअसर थी |

मौज़ में न ले कर गए तो वोह कश्ती ही क्या कश्ती
डूबी मेरी कश्ती वहीं जहा कम मौज़ थी, कम लहर थी |

ज़मीर बेच कर गया दुआ मांगने शिवाले भी, मस्ज़िद भी
लेकिन जब मेरे बच्चे ने पढ़ी वही इबादत, इस बार असर थी |

Sunday, September 12, 2010

मुझे तुमसे सख्त शिकायत है

मुझे तुमसे सख्त शिकायत है


हवा,
जब तुम,थम जाती हो ना !
मौसम और उसके मिजाज़ का पता नही चलता
शहर मे उल्फ़त हो, आगाज़ का पता नही चलता

हवा,
जब तुम, थम जाती हो ना !
बादल, मेरे शहर के बाहर
डेरे डाले बैठे रह्ते है
तुम्हारी उंगलियाँ छूट गयी
हमेशा यही कहते है

हवा,
जब तुम, थम जाती हो ना !
उनकी ज़ुल्फ़े नही गिरती
मेरी पेशानी पर, मेरे चेहरे पर
आँखों मे, आँखों से
बाट जोहते रहते है



हवा,
तुम थोड़ा चला करो !
शहर के आंगन में
बादलों की बारात होगी
दिन तो गुज़रा, सूखा
मगर रात बरसात होगी

हवा,
तुम थोड़ा चला करो !
उन गिरती हुई ज़ुल्फ़ों को हटाने के बहाने
अब जब मुलकात होगी,
इक नयी बात होगी


मुझे तुमसे सख्त शिकायत है
हवा,
तुम थोड़ा चला करो !