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Sunday, September 26, 2010

इबादत, इस बार असर थी !

जिनके पैगाम तक के आने की उम्मीद उमऱ भर ना थी
उनके आने की खबर, हमे छोड शहर भर को थी |

वो मिले तो हमसे, मंजूर है सारे गिले-शिकवे
मगर खामोश गुजरी जो कल शाम, वो कहर थी |

तमाम रात तेरी बिखरी जुल्फों को समेट्ने मे निकल गयी
हटी जब काली बदली, या तो वोह नूर था या फिर सहर थी |

गर नज़र चुराता हूँ भरी मह्फ़िल मे तो यह समझ
वोह मेरि बवफ़ाई नही, तेरी रुसवाई कि फ़िकर थी |

कुछ ना हासिल होगा नसिहते देने से और लेने मे
खता है, तो रहेगी, पर वह खता तेरी ही नज़र थी |

अब्बा ने मेरे किताबे-ए-इश्क़ से कुछ पन्ने निकाल फ़ेक दिये
अब वोह नज़र गयी,वोह इशारे गये तो बाकि किताबें बेअसर थी |

मौज़ में न ले कर गए तो वोह कश्ती ही क्या कश्ती
डूबी मेरी कश्ती वहीं जहा कम मौज़ थी, कम लहर थी |

ज़मीर बेच कर गया दुआ मांगने शिवाले भी, मस्ज़िद भी
लेकिन जब मेरे बच्चे ने पढ़ी वही इबादत, इस बार असर थी |