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Wednesday, November 24, 2010

काश

काश
बिटियाँ तुम नन्हीं ही रहती
तो सागर किनारे चलते
लहरों को हाथों से पकड़ते
साथ सीपियाँ बटोरते

काश
बिटियाँ तुम नन्हीं ही रहती
हम रेत के घरोंदे बनाते
जो वह गिर जाते तो
तुम्हे, कुछ ले दे कर मनाते

काश
बिटियाँ तुम नन्हीं ही रहती
तुम्हारे जन्म-दिन पर
जब तुम मुंह फुलाती
हम लाल गुब्बारे फुलाते
जिन खिलौनों को देख
तुम खुश होती
हम वह खिलौने बन जाते

काश
बिटियाँ तुम नन्हीं ही रहती
तुम्हारे नन्हें बचपन में
हमने अपना बचपन बोया है
जबसे तुम बड़ी हुई हो ,
सिर्फ़ तुमने नहीं,
हमने भी अपना बचपन खोया है |


गौरव : २४ नवम्बर २०१०

Monday, November 15, 2010

मौसम छलने लगे

इक लम्हा ही तो गुज़ारा है, मेरे साथ
क्यूं लगता है तुम साथ फ़िर चलने लगे

सिर्फ़ मेरा वक़्त ही बदला है, मै तो नहीं
अब यार बदल गये, दोस्त बदलने लगे |

पह्ले खलिश थी, तेरे साथ न होने मे
अब तेरे साथ बिताये पल भी खलने लगे |

सब्र करता हूँ पर अब यह आलम है
एक झलक देखी ,अरमानॅ फ़िर मचलने लगे

जबसे बदले-बदले से है तेरे मिज़ाज
लगता है अब मौसम तक छलने लगे |

Tuesday, November 9, 2010

मेरे होने मे या न होने मे !

गर होता वही जो सोचा था सपने संजोने मे
फ़र्क़ क्या रहता आंखे खुली या बंद होने मे ।

दूरियाँ बढ़े मगर न बढ़े कुछ इस तरह
लुत्फ़ जो चला जाये तेरे साथ हसँने या रोने मे |

मसरूफ़ हूँ जिंदगी की जद्दो-जहत मे इस तरह
अब वक़्त ही नही मिलता सपने काटने या बोने मे |

इस बरस कि बरसात, बरसी मगर सूखी ही रही
तुम जो न थे साथ मेरे सूखने, मेरे भिगोने मे |

फ़लसफ़े मेरी जिंदगी के करता हूं मै यू बयाँ
कट गयी जो कुछ पाने मे और कुछ खोने मे |

जब तुम साथ नही, तुम्हरी यादें भी साथ नही
फ़र्क़ क्या पङ्ता है मेरे होने मे या न होने मे ।


गौरव : १० नवम्बर २०१० :

Thursday, November 4, 2010

रोशनी

अमावस की देह्लीज पर रोशनी कर दे
एक टुकड़ा उजाले का, दिया-बाती धर दे

आपके घर की रोशनी हो बुलन्द इतनी
अगर चले हवाँ तो मेरे घर असर कर दे

जिसे डर नहीं हवाओं का उस दिए का साथ दे
किसी के रात के सफ़र को सहर कर दे |