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Tuesday, November 9, 2010

मेरे होने मे या न होने मे !

गर होता वही जो सोचा था सपने संजोने मे
फ़र्क़ क्या रहता आंखे खुली या बंद होने मे ।

दूरियाँ बढ़े मगर न बढ़े कुछ इस तरह
लुत्फ़ जो चला जाये तेरे साथ हसँने या रोने मे |

मसरूफ़ हूँ जिंदगी की जद्दो-जहत मे इस तरह
अब वक़्त ही नही मिलता सपने काटने या बोने मे |

इस बरस कि बरसात, बरसी मगर सूखी ही रही
तुम जो न थे साथ मेरे सूखने, मेरे भिगोने मे |

फ़लसफ़े मेरी जिंदगी के करता हूं मै यू बयाँ
कट गयी जो कुछ पाने मे और कुछ खोने मे |

जब तुम साथ नही, तुम्हरी यादें भी साथ नही
फ़र्क़ क्या पङ्ता है मेरे होने मे या न होने मे ।


गौरव : १० नवम्बर २०१० :

5 comments:

D said...

kya baat hai.... bahut hi sahi tareke se vyakt kara hai bhavon ko... :)

shweta said...

Awesome! bahut sunder likha hai...roz ki daud bhag aur zindagi mai sab kuch hone ke baad bhi khud ke na hone ka ehsaas!....very nice!
super like!!

Nisha said...

behad khubsurat likhahai..
"गर होता वही जो सोचा था सपने संजोने मे
फ़र्क़ क्या रहता आंखे खुली या बंद होने मे ।


इस बरस कि बरसात, बरसी मगर सूखी ही रही
तुम जो न थे साथ मेरे सूखने, मेरे भिगोने मे |"

ye pankitiya vishesh roop se achchi lagi.

aur antim do panktiyon me kuch kami si nazar aayi.
par over all bhtu acha hai.

Pushkar Jha said...

मसरूफ़ हूँ जिंदगी की जद्दो-जहत मे इस तरह
अब वक़्त ही नही मिलता सपने काटने या बोने मे

bahut badhiya gaurav ji...waaah.
Padh kar aalok srivastav ji ki kuch line e` yaad aa gayi .
Aapke liye post kar raha hun :-)
(khaas kar last 2 line )

अब तो ख़ुशी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा,
आसूदगी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा।

सब लोग जी रहे हैं मशीनों के दौर में,
अब आदमी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा।

आई थी बाढ़ गाँव में क्या-क्या न ले गई,
अब तो किसी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा।

घर के बुजुर्ग लोगों की आँखें ही बुझ गईं,
अब रौशनी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा।

आए थे मीर ख़्वाब में कल डाँटकर गए
’क्या शायरी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा ?’!

shayari ke naam pe nayaa sitara - Guarav gupta! bhai waah...aati uttam !!

GauRav said...

aap sabhi ka bahut dhanyawaad!