Pages

Monday, November 15, 2010

मौसम छलने लगे

इक लम्हा ही तो गुज़ारा है, मेरे साथ
क्यूं लगता है तुम साथ फ़िर चलने लगे

सिर्फ़ मेरा वक़्त ही बदला है, मै तो नहीं
अब यार बदल गये, दोस्त बदलने लगे |

पह्ले खलिश थी, तेरे साथ न होने मे
अब तेरे साथ बिताये पल भी खलने लगे |

सब्र करता हूँ पर अब यह आलम है
एक झलक देखी ,अरमानॅ फ़िर मचलने लगे

जबसे बदले-बदले से है तेरे मिज़ाज
लगता है अब मौसम तक छलने लगे |

3 comments:

DR. PAWAN K MISHRA said...

सिर्फ़ मेरा वक़्त ही बदला है, मै तो नहीं
अब यार बदल गये, दोस्त बदलने लगे |
बहुत सुन्दर .......
बधाई

--

Nisha said...

har baar aapki rachna ki kya taarif karu.. bas yahi k har pankti hamesha ki tarah khubsurat hai.

ashwin said...

Bahut sunder.....I eagrly wait for your new posts