Pages

Thursday, December 23, 2010

धूप-छाँव

सुबह के आँगन में
दुल्हन एक नयी-नवेली थी
छाँव उसी धूप की ,
एक पुरानी सहेली थी |

दोपहर के मकान में
छाँव एक पहेली थी
वोह मकान था या शायद
सूरज की एक पुरानी हवेली थी |

शाम को जब सूरज ने
बादलों की चादर ओढ़ी
छाँव के मकान में
धूप अब एक पहेली थी |

रात ने जब फैलाया
अपना सितारों वाला आँचल
अब धूप की वोह सहेली
चार पहर अकेली थी |

पुरानी चारपाई पर
जब जागी एक नयी सुबह
फिर एक बार इन सहेलियों ने
की एक नयी आँख-मिचोली थी |

छाँव उसी धूप की ,
एक पुरानी सहेली थी |

-गौरव , २४ दिसम्बर २०१०

Wednesday, December 22, 2010

मेरी सोच, इन दिनों !!

हवाँ तुम कुछ बातूनी हो गयी हो
क्यों गुनगुनाती हो
हर जगह रुक रुक कर ?

धूप तुम कुछ गुनगुनी हो गयी हो
क्यों करती हो
छाँव से बातें रुक रुक कर ?

बारिश तुम कुछ सूखी हो गयी हो
क्यों करती हो
प्यासों से बातें रुक रुक कर ?

सोचता हूँ

हवाँ तुम बातूनी हुई हो -
या मै चुप हुआ इन दिनों ?
धूप तुम सर्द हुई हो -
या मै तपा हुआ इन दिनों ?
बारिश तुम सूखी हुई हो -
या मै भीगा हुआ इन दिनों ?

सोचता हूँ तो लगता है,

सोच तुम कुछ तंग सी नहीं हो गयी इन दिनों
क्यों करती हो
मुझसे से बातें रुक रुक कर ?

Wednesday, December 1, 2010

तुम !!

नदीं सी मिली थी तुम कल
कल-कल करती बही जा रही थी
जब पूंछा फिर कब मिलोगी
कल, कल कहती जा रही थी

उस पल को बीतें कितने बरस
सत्रह या फिर रहे होंगे अट्ठारह बरस
उस दिन मिलने से, फिर मिलने तक
हर पल गुज़रा जैसे एक बरस

जीवन-डोर में बुनते रहे
कुछ खट्टे और कुछ मीठे प्रसंग
कभी महक उठ्ती मीठी बातें
तो रही कभी त्यौरियाँ तंग
तुम्हरा मेरा साथ ज्यूँ
होली पर पलाश के रंग

वोह साल तो संग ना रहा
मगर हम रहेंगे साथ सालो संग
तुम रहो अर्धांगिनि मेरी
मै रहू सिर्फ़ तुम्हारा पूर्णांग !