Pages

Wednesday, December 1, 2010

तुम !!

नदीं सी मिली थी तुम कल
कल-कल करती बही जा रही थी
जब पूंछा फिर कब मिलोगी
कल, कल कहती जा रही थी

उस पल को बीतें कितने बरस
सत्रह या फिर रहे होंगे अट्ठारह बरस
उस दिन मिलने से, फिर मिलने तक
हर पल गुज़रा जैसे एक बरस

जीवन-डोर में बुनते रहे
कुछ खट्टे और कुछ मीठे प्रसंग
कभी महक उठ्ती मीठी बातें
तो रही कभी त्यौरियाँ तंग
तुम्हरा मेरा साथ ज्यूँ
होली पर पलाश के रंग

वोह साल तो संग ना रहा
मगर हम रहेंगे साथ सालो संग
तुम रहो अर्धांगिनि मेरी
मै रहू सिर्फ़ तुम्हारा पूर्णांग !

5 comments:

Dr.J.P.Tiwari said...

नदीं सी मिली थी तुम कल
कल-कल करती बही जा रही थी
जब पूंछा फिर कब मिलोगी
कल, कल कहती जा रही थी

Bahut hi sundar yamak alnkaar ka prayog.कल-कल करती aur कल, कल कहती me.

Sunil Kumar said...

जब पूंछा फिर कब मिलोगी
कल, कल कहती जा रही थी
अलंकार का अच्छा प्रयोग, बधाई

GauRav said...

तिवारी जी , सुनील जी
प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद
-गौरव

M VERMA said...

तुम रहो अर्धांगिनि मेरी
मै रहू सिर्फ़ तुम्हारा पूर्णांग !---- तथास्तु
अलंकृत रचना

वाणी गीत said...

तुम रहो अर्धांगिनि मेरी
मै रहू सिर्फ़ तुम्हारा पूर्णांग !

सुन्दर !