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Wednesday, December 22, 2010

मेरी सोच, इन दिनों !!

हवाँ तुम कुछ बातूनी हो गयी हो
क्यों गुनगुनाती हो
हर जगह रुक रुक कर ?

धूप तुम कुछ गुनगुनी हो गयी हो
क्यों करती हो
छाँव से बातें रुक रुक कर ?

बारिश तुम कुछ सूखी हो गयी हो
क्यों करती हो
प्यासों से बातें रुक रुक कर ?

सोचता हूँ

हवाँ तुम बातूनी हुई हो -
या मै चुप हुआ इन दिनों ?
धूप तुम सर्द हुई हो -
या मै तपा हुआ इन दिनों ?
बारिश तुम सूखी हुई हो -
या मै भीगा हुआ इन दिनों ?

सोचता हूँ तो लगता है,

सोच तुम कुछ तंग सी नहीं हो गयी इन दिनों
क्यों करती हो
मुझसे से बातें रुक रुक कर ?

2 comments:

निर्मला कपिला said...

धूप तुम सर्द हुई हो -
या मै तपा हुआ इन दिनों ?
बहुत खूब। सुन्दर अभिव्यक्ति। शुभकामनायें।

manish badkas said...

waah...
इन दिनों...
दिल मेरा...
मुझसे है...
कह रहा....
तूऊऊऊ...........
ख्वाब सजा...
तूऊऊऊ...........
जी ले जरा..
है तुझे भी इजाज़त...
कर ले तू भी मोहब्बत...
इन दिनों....