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Thursday, December 23, 2010

धूप-छाँव

सुबह के आँगन में
दुल्हन एक नयी-नवेली थी
छाँव उसी धूप की ,
एक पुरानी सहेली थी |

दोपहर के मकान में
छाँव एक पहेली थी
वोह मकान था या शायद
सूरज की एक पुरानी हवेली थी |

शाम को जब सूरज ने
बादलों की चादर ओढ़ी
छाँव के मकान में
धूप अब एक पहेली थी |

रात ने जब फैलाया
अपना सितारों वाला आँचल
अब धूप की वोह सहेली
चार पहर अकेली थी |

पुरानी चारपाई पर
जब जागी एक नयी सुबह
फिर एक बार इन सहेलियों ने
की एक नयी आँख-मिचोली थी |

छाँव उसी धूप की ,
एक पुरानी सहेली थी |

-गौरव , २४ दिसम्बर २०१०

1 comment:

manish badkas said...

vo meri saheli bhi, hamjoli bhi aur hai paheli bhi...,

mein nahi to vo nahi, vo nahi to jhulas jaata hun mein..!!