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Thursday, November 24, 2011

ख़्वाब


हर सांस-सांस में तेरा, अहसास ही रहे 
नींद मेरी, ख़्वाब तेरे, आस-पास ही रहे 

मिलता तक नहीं, और ख़ामोश भी रहता हूँ 
सोचता हूँ जब मिलू  ,कहने को खास ही रहे

गुफ्तगू   सही न कर,  शिकायते ही कर ले 
क्यों मुझसे मेरा ज़माना  इस कदर उदास रहे 

कुछ समझेंगे इन्हें, सिर्फ चंद अशा़र भर मेरे
तू समझ, अहसास बदन है, ग़ज़ल लिबा़स रहे




Thursday, October 20, 2011

बारिश की बूंदें




बूंदें बूंदें, बारिश की बूंदें 
उतरी नीचे, अखियाँ मूंदे
उड़ती उड़ती, हवा से झगड़ती
आँगन आँगन रिमझिम बरसती 


आते जाते, छत से नाते 
मध्दम-मध्दम करती बातें  
बूंदें बूंदें, बारिश की बूंदें

मन जैसे भीगे अहाते 
आखें जैसे, खुलते छाते 
बूंदें बूंदें, बारिश की बूंदें

आये ख्याल तेरे जैसे 
जैसे गीले, पैर है आते 
बूंदें बूंदें, बारिश की बूंदें

सूखे दिन, गीली रातें  
सुरमई शाम, महकी बातें 
बूंदें बूंदें, बारिश की बूंदें

सौंधी खुशबूँ , कड्वें वादें
खट्टे पल, मीठी चाहतें
बूंदें बूंदें, बारिश की बूंदें 

कैसी बरसी, यह सौगाते
मन फिर, अखियाँ मूंदे
याद करे वोह मुलाकातें 

टिप टिप बरसी, बारिश की बूंदें 
उतरी नीचे अखियाँ मूंदे
बूंदें बूंदें, बारिश की बूंदें 


बूंदें बूंदें बूंदें..

Sunday, August 21, 2011

तुझसे मिलता रहा





आखोँ में उलझता रहा
होठों पे सुलझता रहा
रहा गुमशुदाजुल्फ़ों में
खुशबुओं से मिलता रहा |

सौ बातें उस रात की 
सोह्बते गर्म साँस की
तपता  रहा निगाहों में
बाहों में पिघलता  रहा | 

बिखरे थे गेसू इस कदर
हो रात का टुकड़ा कोई
आखोँ से टपके तारे कई
चाँद ही थाघुलता रहा |

होठों पर चुप्पी का वज़न
खामोशियों की खन-खन
हैरान हूँ मैंइस जुबाँ पर
अब भीतुझे समझता रहा |

आखोँ में उलझता रहा
खुशबुओं से मिलता रहा

© Copyright 2011,  GauRav Gupta

Saturday, July 30, 2011

वोह किताब़

कल शाम
याद की वो पुरानी
किताब़ फिर मिली

हर सफ़े पर
ज्यादा कोशिश कियें बगैर
तेरा नाम ढूँढ लिया मैंने

कुछ सफ़ों के बीच
दर्ज थे सूखें गुलाब़
तेरी मुलाकातें दर्ज थी
कहीं थी गुमशुदा स्याही
शायद थी शामें
जो एक क़र्ज़ थी

कुछ पन्नों के
कोने कटे थे
आधें थे या
पौने फ़़टे थे
मुलाकात के वोह लम्हें
शायद तकरार में बटें थे

कुछ सफ़ों के
कौने मुड़े थे
सोचा होगा
वापिस लौटूंगा एक दिन
जी लूँगा एक बार फिर

लौटा हूँ उन्हीं कौनों पर
सोचता हूँ तुझे आगाज़ दू
किताब़ में कुछ नये सफ़े
फिर से जोड़ दू

© Copyright 2011,  GauRav Gupta

Wednesday, July 27, 2011

तेरे वो किस्से


तेरे वो किस्से 
कहूं  मै  किस से 
मेरी  जुबां पे  
चुप है कब से 

                तेरे वो किस्से 
               मेरे सज़दे  तेरे करम से 
               इश्क सबक, तेरे मद़रसे 

तेरी वो बातें 
आयी है जब से 
मेरी जुबां पे 
छुपाती हूँ  सबसे 

               तेरे वो किस्से 
               मेरे सज़दे  तेरे करम से 
               इश्क सबक, तेरे मद़रसे 


मोरा मन आँगन 
सूखा है कब से 
बन जाओ बदरियाँ
बारिश को तरसे 

              तेरे वो किस्से
              मांगू सावन इक हक से 
              बरसों तुम, हर तरफ से  

तेरे वो इशारे 
जीती हूँ उनसे 
हर सूँ  नज़ारे 
मर जाऊं शर्म से 

           तेरे वो किस्से
           मरती  हूँ तेरी फ़िक़र से
          जीती   हूँ तेरे फ़ज़ल  से  
    
तेरे वो किस्से

कहूं  मै  किस से 


© Copyright 2011,  GauRav Gupta

Sunday, June 26, 2011

है तू कहाँ ?



आखोँ के मौसम भीगे-भीगे से
फिर क्यूँ यह दिन रीते-रीते से

तेरी आहट, आस है
तेरी चाहत, प्यास है
बाँवरे-बाँवरे से दिन
शामें भी उदास है
है तू कहाँ ?

जुल्फों के साये महके-महके से
बिन तेरे अरमान बहके बहके से

कैसी यह दूरी
साँसे बनी मज़बूरी
मर-मिटा तुझ पर
क्यों जीना फिर जरुरी
है तू कहाँ ?

बाँहे तेरी मखमली-मखमली सी
बिन तेरे हर रात खल-बली सी

अब सिर्फ सलवटें है
बेचैन सारी करवटें
कटी रात आखों में
या रात हम कटे है
है तू कहाँ ?


© Copyright 2011,  GauRav Gupta

Friday, April 15, 2011

नदीं के पाँव



एक दिन
नदीं, बहते-बहते 
किनारें से कहने लगी 
कब तक चलोगे, मेरे साथ यूँही 
                 थक    जाओगे?
 अगर मै बह गयी ,तो क्या तुम मुझे 
                  समेट पाओंगे ?

किनारें की भावनायें थी 
भावनाओ में बह गया 
जानता था, उत्तर 'ना' है 
पर हाँ कह गया  

बोला, जो तुम कहों
             वोह ही सही| 
तुम कभी इतनी 
            बहो तो सही|

बहाव के हर मोड़ परहाथ  दूंगा |
पर्वत से सागर तक़ ,साथ दूंगा |

नदीं सकुचाई,
     कुछ बही,
        कुछ थमी|

फिर समझी--

किनारा कब अपनी बाँहों में
         नदी समेट पाया है,
अपना अस्तित्व तक़ गँवा बैठा
  जब बहाव नदीं में आया है|

फिर भी दोनों साथ चलते रहे

किनारा
            साथ में खुश था।
नदीं        
     बहने में खुश थी।

हर खुशी की   एक उम्र होती है,
खुशी बड़ी हो, तो कम होती है।


इन दिनों, सागर ने
गागर बन, नदीं  को समेटा है,
किनारा अब भी किनारे बैठा है |

जब-जब नदीं को
किनारें की याद आती है
अब वह लहर बन
किनारें को छूँ
कर चली जाती है

रही बात किनारें की,
हो किनारा, दर-किनार सा
किनारें खड़े होकर
जाती हुई नदीं के पाँव देखता है |

कोई नहीं जानता,
कोई नहीं समझता
किनारें को
कि
हाथ उसके गीले है
मगर मन रीता-रीता है,
पर्वत से सागर तक
नदीं का साथ
सूखा ही बीता है ।


-गौरव

Saturday, March 19, 2011

ग़र ख़लिश है..


ग़र ख़लिश है और है बेकरारीतो आ उसे नाम दे
वक़्त है सही, चल तेरे मेरे रिश्ते को कुछ नाम दे |            

जानता हूँघर से निकलने पर तेरेहै हज़ार बंदिशे
यूँ करजुम्मे पर वाईज़ के हाथों ही कुछ पैगाम दे |           

मशहूर हो गए तेरे-मेरे इश्क के किस्से ,सारे शहर में 
छोड़ आखोँ से इशारेसारे सलाम अब सरे-आम दे |

जब-जब खुलती है जुल्फ़े तेरी,  घटा सी छा जाती है
 पास बैठमेरी उँगलियों को वोह पुराना काम दे |

ठंडे सायें तेरी जुल्फों केगर्म बवंडर तेरी साँसों के
मौसमों के ऐसे इम्तज़ाजमुझे ता-उम्र, तमाम दे |            

गौर से देखइतमिनान-ऐ-आफ़ताब, शाम की बांहों में
तू शाम बनबनूँ मै आफ़ताब,ऐसा मुझे अब आराम दे |  

सुनना है ग़रसिर्फ शेर भर मेरे, तो नज़रों के जाम दे
ग़ज़ल बनानी हो तो अब होठों का होठों पर मुकाम दे |




ख़लिश( pinch/चुभन) /  वाईज़2 ( priest/मौलवी) /  इम्तज़ाज3  ( mixture)

 -गौरव 



Saturday, February 12, 2011

तुम रहे गीत मेरे !


तुम रहे गीत मेरे हुई राग-मल्हाँर मैं तो
उंगलियों की छुंअन से, हुई तार-तार सितार मैं तो

मेरी नींद की डोली मेंबिठाये तेरे सपने हज़ार
संभाल ना पाऊ डोली-भार, हुई थकी कहार मैं तो 

पूरी रात गुज़ार दी, तेरी यादों कि दस्तक सुनते हुए
इंतज़ार में, बेकरार मेंवक्त-बेवक्त हुई किवार मैं तो

यकीन था महकेंगी ज़रूर, ख़बरें तेरे-मेरे इश्क़ की
फिर भी हर गली, हर चौबार, हुई शर्मसार  मैं तो

म़दरसे--इश्क़ में, दाख़िला तो ले लिया लेकिन
इम्तिहान दिये, नतीज़े आये, साबित हुई गँवार मैं तो

यह मौसम है मेरे महकते मन, तेरे दहकते तन का
इसी मौसम--बारिश की पहली हुई फ़ुहार मैं तो

ज़माना समझता रहा मुझें गज़ल सिर्फ तेरी, "गौरव"
सिर्फ तेरी हू, सोचते-सोचते कबकी हुई अहंकार मैं तो

गढ़ती रही ख़्वाबों के बर्तन, सौंधी ख़ुशबूओं से
तेरे इश्क़ में कभी माटी बनी, कभी हुई कुम्हार मैं तो

तुम रहे गीत मेरे, हुई राग-मल्हाँर मैं तो
इस् चौदह फ़रवरी को, प्यार का हुई त्यौहार मैं तो

-गौरव //