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Monday, January 24, 2011

श्रध्दांजलि : पंडित भीमसेन जोशी

पंडित भीमसेन जोशी

जिसके साथ गुनगुना कर
आज वोह "भीम" मेरी
आखोँ के सामने रह गया

अब ''गायकी'' को
सिर्फ उसके 'ख़याल' आया करेंगे
सुर की इस् नदी को
आज सागर जो मिलने को कह गया


जो लगाता रहा आवाज़
किराने-घराने का वोह सरताज़
वोह आज
किनारे कर गया
हरि जो उसे
'घर-आने' को कह गया

वोह 'गंधर्व' आज बह गया



-गौरव /२४ जनवरी २०११/

Sunday, January 16, 2011

पापा : आज बहुत याद आयें !

आज फिर छत पर
रंग बिरंगी पतंगे छायीं हैं,
यादें पुरानी, पतंग बन
फिर आखों में घिर आयीं हैं |


मेरी ख़्वहिशों को
पतंग बनाया था, आपने,
ढ़ील उतनी दी
जितना उड़ाया था, मैंने |

आज फिर मैं छत पर चढ़ा हूँ,
मैं यादोँ कि डोर पकड़ें खड़ा हूँ |

बिटियाँ के संग, नयी
पतंग के जोतें बाँध रहा हूँ,
साथ-साथ
पुरानी यादों के धागे से
वो पुरानी पतंग साध रहा हूँ |

समय कि हवा ने
पुरानी पतंग को
इस कदर खीचा है
यादोँ कि डोर से
दिल कि उंगलियां ,
आज फिर कट गयी है |

लोग कहते है,
मेरी वह पुरानी पतंग,
कब की कट गयी है

पर मैं जानता हूँ
मेरी वह पुरानी पतंग
आसमानी रंग में रंग गयी है
वो कटी नहीं ,
वह अब सिर्फ नज़र नहीं आती
बस आसमाँ में बट गयीं है |

आज फिर, किसी ने मुझे
आसमाँ से बात करते टोका है
मैंने तो सिर्फ
उस आसमानी पतंग को
अपने आखों में रोका है |

Saturday, January 15, 2011

शुभकामनाँये : मकर संक्रांति

चलो आज हम अपने ख़्वाब बाट ले
साथ मिल कर तिल और गुड़ चाट ले |

बोयी थी जो ख़लिश पिछले बरस
वोह अब पक़ चुकी होगी मेरे दोस्त ,
कुछ देर आज शाम साथ बैठ,
ला अब वोह फ़सल भी काट ले |

ग़िले होंगे और होंगे, शिकवे भी
न मै रखू न तू मन मे रख ,
थोड़ी देर तक मेरी ही सुन ले
फ़िर तेरी बारी, चाहे तो डांट ले |

चल करते है सौदा अबके बरस
कुछ इस तरह, कुछ उस तरह,
या तो मै तेरी डोर संभाल लू
या इस बार तू मेरी पतंग काट ले |

साल सिर्फ़ अभी शुरू भर हुआ है
और इरादों की पहली फ़सल है,
जा वादों की छन्नी ले आ
और सिर्फ अच्छा वक़्त छाँट ले |

चल इस बार सारी रेवड़ियाँ तेरी
मगर कमबख्त लड्डू तो आधे बाट ले

चलो आज हम अपने ख़्वाब बाट ले
साथ मिल के तिल और गुड़ चाट ले |


-गौरव : मकर संक्रांति //२०११//