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Sunday, January 16, 2011

पापा : आज बहुत याद आयें !

आज फिर छत पर
रंग बिरंगी पतंगे छायीं हैं,
यादें पुरानी, पतंग बन
फिर आखों में घिर आयीं हैं |


मेरी ख़्वहिशों को
पतंग बनाया था, आपने,
ढ़ील उतनी दी
जितना उड़ाया था, मैंने |

आज फिर मैं छत पर चढ़ा हूँ,
मैं यादोँ कि डोर पकड़ें खड़ा हूँ |

बिटियाँ के संग, नयी
पतंग के जोतें बाँध रहा हूँ,
साथ-साथ
पुरानी यादों के धागे से
वो पुरानी पतंग साध रहा हूँ |

समय कि हवा ने
पुरानी पतंग को
इस कदर खीचा है
यादोँ कि डोर से
दिल कि उंगलियां ,
आज फिर कट गयी है |

लोग कहते है,
मेरी वह पुरानी पतंग,
कब की कट गयी है

पर मैं जानता हूँ
मेरी वह पुरानी पतंग
आसमानी रंग में रंग गयी है
वो कटी नहीं ,
वह अब सिर्फ नज़र नहीं आती
बस आसमाँ में बट गयीं है |

आज फिर, किसी ने मुझे
आसमाँ से बात करते टोका है
मैंने तो सिर्फ
उस आसमानी पतंग को
अपने आखों में रोका है |

4 comments:

Amit Bhatnagar said...

Very nice, beautifully expressed

महेश शर्मा MAHESH SHARMA said...

बहुत मर्मस्पर्शी..यादों के गुजरते कारवाँ में गुबार अकेलेपन की टीसों का....

amitksharmaujn said...

kuch purani yade fhir taja ho gai......

montu said...

very nice