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Saturday, February 12, 2011

तुम रहे गीत मेरे !


तुम रहे गीत मेरे हुई राग-मल्हाँर मैं तो
उंगलियों की छुंअन से, हुई तार-तार सितार मैं तो

मेरी नींद की डोली मेंबिठाये तेरे सपने हज़ार
संभाल ना पाऊ डोली-भार, हुई थकी कहार मैं तो 

पूरी रात गुज़ार दी, तेरी यादों कि दस्तक सुनते हुए
इंतज़ार में, बेकरार मेंवक्त-बेवक्त हुई किवार मैं तो

यकीन था महकेंगी ज़रूर, ख़बरें तेरे-मेरे इश्क़ की
फिर भी हर गली, हर चौबार, हुई शर्मसार  मैं तो

म़दरसे--इश्क़ में, दाख़िला तो ले लिया लेकिन
इम्तिहान दिये, नतीज़े आये, साबित हुई गँवार मैं तो

यह मौसम है मेरे महकते मन, तेरे दहकते तन का
इसी मौसम--बारिश की पहली हुई फ़ुहार मैं तो

ज़माना समझता रहा मुझें गज़ल सिर्फ तेरी, "गौरव"
सिर्फ तेरी हू, सोचते-सोचते कबकी हुई अहंकार मैं तो

गढ़ती रही ख़्वाबों के बर्तन, सौंधी ख़ुशबूओं से
तेरे इश्क़ में कभी माटी बनी, कभी हुई कुम्हार मैं तो

तुम रहे गीत मेरे, हुई राग-मल्हाँर मैं तो
इस् चौदह फ़रवरी को, प्यार का हुई त्यौहार मैं तो

-गौरव //