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Saturday, March 19, 2011

ग़र ख़लिश है..


ग़र ख़लिश है और है बेकरारीतो आ उसे नाम दे
वक़्त है सही, चल तेरे मेरे रिश्ते को कुछ नाम दे |            

जानता हूँघर से निकलने पर तेरेहै हज़ार बंदिशे
यूँ करजुम्मे पर वाईज़ के हाथों ही कुछ पैगाम दे |           

मशहूर हो गए तेरे-मेरे इश्क के किस्से ,सारे शहर में 
छोड़ आखोँ से इशारेसारे सलाम अब सरे-आम दे |

जब-जब खुलती है जुल्फ़े तेरी,  घटा सी छा जाती है
 पास बैठमेरी उँगलियों को वोह पुराना काम दे |

ठंडे सायें तेरी जुल्फों केगर्म बवंडर तेरी साँसों के
मौसमों के ऐसे इम्तज़ाजमुझे ता-उम्र, तमाम दे |            

गौर से देखइतमिनान-ऐ-आफ़ताब, शाम की बांहों में
तू शाम बनबनूँ मै आफ़ताब,ऐसा मुझे अब आराम दे |  

सुनना है ग़रसिर्फ शेर भर मेरे, तो नज़रों के जाम दे
ग़ज़ल बनानी हो तो अब होठों का होठों पर मुकाम दे |




ख़लिश( pinch/चुभन) /  वाईज़2 ( priest/मौलवी) /  इम्तज़ाज3  ( mixture)

 -गौरव