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Saturday, July 30, 2011

वोह किताब़

कल शाम
याद की वो पुरानी
किताब़ फिर मिली

हर सफ़े पर
ज्यादा कोशिश कियें बगैर
तेरा नाम ढूँढ लिया मैंने

कुछ सफ़ों के बीच
दर्ज थे सूखें गुलाब़
तेरी मुलाकातें दर्ज थी
कहीं थी गुमशुदा स्याही
शायद थी शामें
जो एक क़र्ज़ थी

कुछ पन्नों के
कोने कटे थे
आधें थे या
पौने फ़़टे थे
मुलाकात के वोह लम्हें
शायद तकरार में बटें थे

कुछ सफ़ों के
कौने मुड़े थे
सोचा होगा
वापिस लौटूंगा एक दिन
जी लूँगा एक बार फिर

लौटा हूँ उन्हीं कौनों पर
सोचता हूँ तुझे आगाज़ दू
किताब़ में कुछ नये सफ़े
फिर से जोड़ दू

© Copyright 2011,  GauRav Gupta

3 comments:

Deepti Agarwal said...

Bahut hi badiya bhaiya... :)

Pushkar Jha said...

कुछ सफ़ों के
कौने मुड़े थे
सोचा होगा
वापिस लौटूंगा एक दिन
जी लूँगा एक बार फिर


waah superb...kya baat ahin...laakh rupayee ke baat kahin ahin aapne !

GauRav said...

धन्यवाद्