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Sunday, August 21, 2011

तुझसे मिलता रहा





आखोँ में उलझता रहा
होठों पे सुलझता रहा
रहा गुमशुदाजुल्फ़ों में
खुशबुओं से मिलता रहा |

सौ बातें उस रात की 
सोह्बते गर्म साँस की
तपता  रहा निगाहों में
बाहों में पिघलता  रहा | 

बिखरे थे गेसू इस कदर
हो रात का टुकड़ा कोई
आखोँ से टपके तारे कई
चाँद ही थाघुलता रहा |

होठों पर चुप्पी का वज़न
खामोशियों की खन-खन
हैरान हूँ मैंइस जुबाँ पर
अब भीतुझे समझता रहा |

आखोँ में उलझता रहा
खुशबुओं से मिलता रहा

© Copyright 2011,  GauRav Gupta