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Friday, December 28, 2012

अमानत




कुछ कंधो पर सर आज शर्म से झुके है
और काफ़ी हाथों में सिर्फ झंडे ही दिखे है ।

उड़ गयी अमानत चिड़िया इस आँगन से
न दिखे, मगर वो  जा़ल अब भी वहीँ बिछे है ।

यह कैसा शहर है और कैसी इंसानियत
जहाँ आदमी की शक्ल में सिर्फ भेड़िये दिखे है ।

दौड़ती थी, उछलती थी जिंदगी जिस फर्श पर
अब उस फर्श पर का़लीन-ऐ-ख़ामोशी बिछे है ।



© Copyright 2012,  GauRav Gupta

बस तुम आ जाया करों !!


तुम ना आया करों, आँधी की तरह
तुम्हारे आने से
तुम्हारे जाने तक
रह जाती हूँ,
पतझड़ झड़ती शाख की तरह ।

तुम ना आया करों, तूफानों  की तरह
तुम्हारे घिर आने से
तुम्हारे गुज़र जाने तक
रह जाती हूँ,
हिचकोले खाती नाँव की तरह ।


तुम ना आया करों, बरसात की तरह
तुम्हारे बरसने से
मेरे सूखने तक
रह जाती हूँ,
आखों में रुकी नमी की तरह ।

तुम आया करों, जैसे
दबे पाँव, पलाश के सूखे पत्तों पर
ठंडी छाँव, बरगद से ढकी छतों पर
नर्म ख्व़ाब, नींद से रुकी रातों पर
पुरानी  शराब, झील की मुलाकातों पर

फिर सोचती हूँ
तुम मौसम न देखा करो
सच तो यह है,
बस तुम आ जाया करों !!


© Copyright 2012,  GauRav Gupta

Monday, November 19, 2012

एक गाँव


दूर कही, एक गाँव है
आसमानी सी छाँव है
पीपल-पीपल रहे चबूतरे
नदी किनारे एक नाँव है |

किनारे बैठा, मन कही
बाट जोहता, सुनता नहीं
भँवर बने निगाह से
यादों के यही काम है |

धडकनों के शोर में
सुन न पाउ आहटें
शोर कहेधड़कन कहे
यह आहट तेरी, 
  तेरे ही पाँव है |


धूंप सा दर्द, था सीने में
वहीं चमक थी, जीने में
शाम जो पिघली आँखों से
आँखों के खाली गाँव है |

दूर कही, वही एक गाँव है |


© Copyright 2012,  GauRav Gupta

Tuesday, November 13, 2012

यह अमावस, कुछ पावस है !!


यह अमावस 
कुछ पावस है 
यह वोह रात नहीं,
जिसमे रौशनी की बात नहीं !

आज फिर चढेगा  सूरज 
दिन के माथे 
और उतरेगा भी 
सोचेगा, कर्म पूरा हुआ 
आखिर रौशनी से भरा 
एक और दिन दिया 
मेरा धर्म पूरा हुआ   

और चाँद,
  जाने किस बात पर 
शर्माया या  ऐंठा है  
आज  काम पर ना आया 
घर पर बैठा  है 

पर बात चल रही  थी 
रौशनी की !

सूरज ने अपना  कर्म,  पूरा  समझा  
चाँद ने अपनी  शर्म, अधूरी  समझा 

वोह शाम थी 
जिसने उजाले के मर्म को समझा 
लौटते हुए सूरज से 
ले लिया रौशनी  का गमछा 

उजाले की तिजोरी की चाबियाँ 
सूरज ने यह कह  कर दे दी 
"पहरेदारी  की बात है 
ध्यान से काम करना 
देख अँधेरी स्याह  रात है
बड़ा  काम है 
दिन से शाम करना "


और शाम 
उसने कुछ अलग किया है 
तिजोरी की चाबियाँ सौप दी उसे 
जिसने उसे विश्वास  दिया है 
और वोह 'दिया
लिखेगा एक नया इतिहास 
क्योकि 
अब जब पहरेदारी की बात होगी 
शायद  इस  बाती की
इस दिए की बिसात होगी 

रात भर  तिमिर से लड़ कर   
शाम का विश्वास  जिसने जिया 
जो घुलता रहा खुद अकेला 
रोशन हर आँगन जिसने दिया 

दीया !!

Wednesday, March 7, 2012

होली


पलाश हुआ , वसंत हमजोली
टेसू बिखरा , संग अबीर टोली

आसमाँ सहलायेबादल हौले हौले 
जब तब बूँदें खेले , धरती से होली

अबीर मनअधीर तन
मन मलंग,  नए  रंग 
कच्ची रंजीशे, कच्चे रंग
तेरे संगसब सच्चे रंग

इक बरस लगा आने मेंयह होली  
तुझ पर रंग 'बरसानेमेंयह होली  
मै रहूँ बावरातुम रहो भोली 
गाये फाग, "बरसानेमें, इस होली 




Thursday, February 23, 2012

एक सच्चे झूठ कि कविता




सच में,
मेरे एक झूठ को
पैदाइशी कैंसर है 
रोज मरता है 
फिर भी इतराता है 

सच बड़ा होकर भी
कड़वे का कड़वा
झूठ जवां हुआ नहीं,
सफ़ेद सा हो जाता है 

सच डरपोक है 
होमवर्क किया है
इसके बावजूद भी 
टेबल के नीचे छुपता है 

सच बोल कर 
जाने कितने रिश्ते खोये 
लेकिन उस से कम 
जो झूठ बोल कर बचा रखे है 

लेकिन फिर 
झूठे को ही सही
लेकिन सच में
सच को चाहना ज़रूरी नहीं 
ज़रूरी है-
सच को बोलना

क्योंकि सच में 
सच को मतलब नहीं
की तुम्हारा उसमे 
विशवास है या नहीं 

उसे तो आता है 
अपने पैरों पर खड़े होना