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Thursday, February 23, 2012

एक सच्चे झूठ कि कविता




सच में,
मेरे एक झूठ को
पैदाइशी कैंसर है 
रोज मरता है 
फिर भी इतराता है 

सच बड़ा होकर भी
कड़वे का कड़वा
झूठ जवां हुआ नहीं,
सफ़ेद सा हो जाता है 

सच डरपोक है 
होमवर्क किया है
इसके बावजूद भी 
टेबल के नीचे छुपता है 

सच बोल कर 
जाने कितने रिश्ते खोये 
लेकिन उस से कम 
जो झूठ बोल कर बचा रखे है 

लेकिन फिर 
झूठे को ही सही
लेकिन सच में
सच को चाहना ज़रूरी नहीं 
ज़रूरी है-
सच को बोलना

क्योंकि सच में 
सच को मतलब नहीं
की तुम्हारा उसमे 
विशवास है या नहीं 

उसे तो आता है 
अपने पैरों पर खड़े होना