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Tuesday, April 7, 2015

आना मेरे गाँव

पीपल के खूँटें से बंधती है छाँव
आँगन चौबारे में फुर्सत के पाँव
इक बरगद बूढ़ा सा
इतिहास का पन्ना
बरगद तू ढूंढ लेआना मेरे गाँव

पनघट पे घुलती है सुरमई शाम
रुकते किनारे और बहते पयाम
इक नदी है बहती
सुन क्या है वह कहती
नदी की बात सुन, आना मेरे गाँव

बारिश की बूंदों से छत है सनी
खेतों की मांग में है डगर बनी
इक रास्ता अकेला
कुछ सीधा कुछ टेढ़ा
टेढ़ा है रास्ता पर सीधा है गाँव

बरगद तू ढूंढ लेआना मेरे गाँव
पीपल के खूँटें से बंधती है छाँव
आँगन चौबारे में फुर्सत के पाँव


© Copyright 2015,  GauRav Gupta

मैं कैसे लिखूं ये गीत नया


मैं कैसे लिखूं ये गीत नया
कैसे कह दू दास्तान
आखों में जो नहीं अक्स तेरा
ख़ामोश भी तेरी जुबान

लिखे थे ख़त जो तेरी याद में
सारे के सारे धुंधला ही गये
मिलती ही नहीं तस्वीर तेरी
यादें भी रख कर भूल गया

मैं कैसे लिखूं ये गीत नया
कैसे कह दू दास्तान

रूठे थे जो तुम ख्व़ाब में
ख़्वाब ही मानो रूठ गये
प्यासी सी रही शब मेरी
दिन भी सूखा बीत गया

मैं कैसे लिखूं ये गीत नया
कैसे कह दू दास्तान

सोचा था फिर इस रात में
बनाऊगा मैं अक्स तेरा
कहाँ से लाऊ स्याह चाँदनी
बनता नहीं अब्र कागज़ नया

मैं कैसे लिखूं ये गीत नया

कैसे कह दू दास्तान

© Copyright 2015,  GauRav Gupta