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Tuesday, April 7, 2015

आना मेरे गाँव

पीपल के खूँटें से बंधती है छाँव
आँगन चौबारे में फुर्सत के पाँव
इक बरगद बूढ़ा सा
इतिहास का पन्ना
बरगद तू ढूंढ लेआना मेरे गाँव

पनघट पे घुलती है सुरमई शाम
रुकते किनारे और बहते पयाम
इक नदी है बहती
सुन क्या है वह कहती
नदी की बात सुन, आना मेरे गाँव

बारिश की बूंदों से छत है सनी
खेतों की मांग में है डगर बनी
इक रास्ता अकेला
कुछ सीधा कुछ टेढ़ा
टेढ़ा है रास्ता पर सीधा है गाँव

बरगद तू ढूंढ लेआना मेरे गाँव
पीपल के खूँटें से बंधती है छाँव
आँगन चौबारे में फुर्सत के पाँव


© Copyright 2015,  GauRav Gupta

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