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Saturday, October 31, 2015

लौटा दो –सारे तमगे


लाओ तुम भी लौटा दो,
सारे तमगे-
सारे फीते ,
वह शॉल और श्रीफल भी!
तब हम साबित कर पायेंगे
कि
राजनीति की स्याही-
जब हो जाती हैं ज्यादा
खा जाती हैं, कलम को,
और तलवार जैसी धार को

ऐसे ही गर चला,
तो यह जरूर साबित होगा

भले ही मिले हो तुम्हें
तमगे, उन आकाओं से
पर मिले तो थे क्योंकि-
तुम ही कर पाये आत्मसात

मेरे ‘मन की बात’ 

सुनो,
वोह तमगे, सिर्फ तुम्हारे नहीं थे!
वोह शॉल और श्रीफल भी!
तुम्हारी कलम बोलती थी
तो मै सह जाता था,
अपनी चुप्पियों का वजन

तुम्हें गर लौटाना ही है,
तो उस दिन लौटाना
जब लगने लगे-
अब तुम्हारी कलम
ना उठा पायेगी,
मेरी चुप्पियों के बोझ को

© Copyright 2015,  GauRav Gupta