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Saturday, October 31, 2015

लौटा दो –सारे तमगे


लाओ तुम भी लौटा दो,
सारे तमगे-
सारे फीते ,
वह शॉल और श्रीफल भी!
तब हम साबित कर पायेंगे
कि
राजनीति की स्याही-
जब हो जाती हैं ज्यादा
खा जाती हैं, कलम को,
और तलवार जैसी धार को

ऐसे ही गर चला,
तो यह जरूर साबित होगा

भले ही मिले हो तुम्हें
तमगे, उन आकाओं से
पर मिले तो थे क्योंकि-
तुम ही कर पाये आत्मसात

मेरे ‘मन की बात’ 

सुनो,
वोह तमगे, सिर्फ तुम्हारे नहीं थे!
वोह शॉल और श्रीफल भी!
तुम्हारी कलम बोलती थी
तो मै सह जाता था,
अपनी चुप्पियों का वजन

तुम्हें गर लौटाना ही है,
तो उस दिन लौटाना
जब लगने लगे-
अब तुम्हारी कलम
ना उठा पायेगी,
मेरी चुप्पियों के बोझ को

© Copyright 2015,  GauRav Gupta

Tuesday, April 7, 2015

आना मेरे गाँव

पीपल के खूँटें से बंधती है छाँव
आँगन चौबारे में फुर्सत के पाँव
इक बरगद बूढ़ा सा
इतिहास का पन्ना
बरगद तू ढूंढ लेआना मेरे गाँव

पनघट पे घुलती है सुरमई शाम
रुकते किनारे और बहते पयाम
इक नदी है बहती
सुन क्या है वह कहती
नदी की बात सुन, आना मेरे गाँव

बारिश की बूंदों से छत है सनी
खेतों की मांग में है डगर बनी
इक रास्ता अकेला
कुछ सीधा कुछ टेढ़ा
टेढ़ा है रास्ता पर सीधा है गाँव

बरगद तू ढूंढ लेआना मेरे गाँव
पीपल के खूँटें से बंधती है छाँव
आँगन चौबारे में फुर्सत के पाँव


© Copyright 2015,  GauRav Gupta

मैं कैसे लिखूं ये गीत नया


मैं कैसे लिखूं ये गीत नया
कैसे कह दू दास्तान
आखों में जो नहीं अक्स तेरा
ख़ामोश भी तेरी जुबान

लिखे थे ख़त जो तेरी याद में
सारे के सारे धुंधला ही गये
मिलती ही नहीं तस्वीर तेरी
यादें भी रख कर भूल गया

मैं कैसे लिखूं ये गीत नया
कैसे कह दू दास्तान

रूठे थे जो तुम ख्व़ाब में
ख़्वाब ही मानो रूठ गये
प्यासी सी रही शब मेरी
दिन भी सूखा बीत गया

मैं कैसे लिखूं ये गीत नया
कैसे कह दू दास्तान

सोचा था फिर इस रात में
बनाऊगा मैं अक्स तेरा
कहाँ से लाऊ स्याह चाँदनी
बनता नहीं अब्र कागज़ नया

मैं कैसे लिखूं ये गीत नया

कैसे कह दू दास्तान

© Copyright 2015,  GauRav Gupta

Saturday, November 2, 2013

शुभ दीपावली


तिमिर से लडूंगा मैं,
किया इक चौख़ट से वादा यही |
  
सोंप दू अमानत उजि़यारे की 
किया उस सुबह से वादा अभी  |

पूछ लेना तुम बावरी हॅवा से 
लङ्खडाया हूं, डगमगाया हूं
पर न शरमाया, लड़ने से कभी |
  
मन अयोध्या, खुशियां भी राम सी
मिट गया अँधेरे का रावण, मैं जला तभी |



© Copyright 2013,  GauRav Gupta

Saturday, October 12, 2013

उड़ जा !

चिड़ियाँ ओ चिड़ियाँ
उड़ जा री चिड़ियाँ
बांधें ना तुझको, मोरी नज़रियाँ

पंख है ये जो तेरे
जैसे अरमान भी मेरे
फैला के उड़ जा, शाम-सवेरे

बादल की सखी बन
करले थोडा सा जतन
उड़ जा री चिड़ियाँ
बिसरा के मोरी अटरियाँ

हवाओं की बात सुन
तजदे माटी के रंग
रच इक उड़ती सुखन
उड़ जा री चिड़ियाँ



© Copyright 2013,  GauRav Gupta

Monday, May 13, 2013

शिकायत


हर बात पर तुम
      शिकायत करो,
जो मैं चुप रहूँ तो
    बैय्याँ ठोड़ी धरों |

चुप्पियों के घूँघरू
      जो बजने लगे,
कंगनों को बजा कर
अदावत करो |

सिमटी चादर से भी
     दुश्मनी तुम्हारी,
तकिया बीच में रख
 सरहदें करो |

हार भी न मानू
      न तुम जीतो,
शर्तों के दस्तावेज
      दस्तखत करो |

 तेरे मेरे रूठने के
     अंदाज मुख्तलिफ,
अब शर्त यह की
     एक मानिंद करो |






© Copyright 2013,  GauRav Gupta


Friday, December 28, 2012

अमानत




कुछ कंधो पर सर आज शर्म से झुके है
और काफ़ी हाथों में सिर्फ झंडे ही दिखे है ।

उड़ गयी अमानत चिड़िया इस आँगन से
न दिखे, मगर वो  जा़ल अब भी वहीँ बिछे है ।

यह कैसा शहर है और कैसी इंसानियत
जहाँ आदमी की शक्ल में सिर्फ भेड़िये दिखे है ।

दौड़ती थी, उछलती थी जिंदगी जिस फर्श पर
अब उस फर्श पर का़लीन-ऐ-ख़ामोशी बिछे है ।



© Copyright 2012,  GauRav Gupta